हर महीने इस्तेमाल हो रहे 90 लाख मास्क और 76 लाख ग्लव्स, नहीं हुए डिस्पोज तो होगा ये अंजाम

हर महीने इस्तेमाल हो रहे 90 लाख मास्क और 76 लाख ग्लव्स, नहीं हुए डिस्पोज तो होगा ये अंजाम

नई दिल्ली। पिछले साल 15 अगस्त को लाल किले से प्रधानमंत्री मोदी ने सिंगल यूज प्लास्टिक का कम से कम इस्तेमाल करने की अपील की थी। साथ ही उन्होंने ये भी कहा था कि 2022 तक देश को सिंगल यूज प्लास्टिक से फ्री कर दिया जाएगा। जब मोदी ये भाषण दे रहे थे, तब उन्हें शायद इसका अंदाजा भी नहीं होगा कि 6 महीने के भीतर ही एक ऐसी महामारी आएगी, जिससे बचने के लिए प्लास्टिक का ही इस्तेमाल होगा।

मोदी ने जब ये भाषण दिया तो उसके ठीक 168 दिन बाद 30 जनवरी को देश में कोरोनावायरस का पहला मरीज मिल गया। हालांकि, तब तक दुनिया के कई देशों में कोरोनावायरस पहुंच भी चुका था और उसके आते ही दुनियाभर में पीपीई किट, ग्लव्स, फेस शील्ड, मास्क की डिमांड बढ़ गई। ये सब वो चीजें हैं, जो किसी न किसी प्लास्टिक से बनती हैं और कोरोना से बचने में यही मददगार भी साबित हो रही हैं।

डब्ल्यूएचओ का अनुमान है कि दुनियाभर में हर महीने कोरोना से निपटने के लिए 90 लाख मास्क, 76 लाख ग्लव्स और 16 लाख गॉगल्स की जरूरत पड़ती है। अकेले हमारे देश में ही रोजना 4.5 लाख पीपीई किट्स बन रही हैं। कोरोनावायरस से बचने के लिए भले ही हमें इन सबका इस्तेमाल करना जरूरी है, लेकिन एक चिंता भी है और वो इनको डिस्पोज करना। हालांकि, दुनियाभर की सरकारों ने कोरोना से निकलने वाले मेडिकल वेस्ट को डिस्पोज करने के लिए गाइडलाइंस बनाई हुई हैं। एसोसिएटेड चैम्बर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री यानी एसोचैम की एक स्टडी बताती है कि 2022 तक हमारे देश से रोजोना 775 टन से ज्यादा मेडिकल वेस्ट निकलेगा। अभी रोज 550 टन से ज्यादा मेडिकल वेस्ट निकल रहा है।

लॉकडाउन से पहले और भारत में जब कोरोना के 500 से भी कम मामले थे, तब सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (सीपीसीबी) ने कोरोना की वजह से निकलने वाले मेडिकल वेस्ट को डिस्पोज करने के लिए गाइडलाइन जारी की थी। इसके तहत कोरोना वार्ड से जो भी मेडिकल वेस्ट निकलेगा, उसे एक बैग में रखा जाएगा और उस पर ‘कोविड वेस्ट’ लिखा जाएगा।


ये फोटो दिल्ली के एक अस्पताल की है। यहां हेल्थकेयर वर्कर्स कोविड वेस्ट को ले जा रहे हैं।

कोरोना से बचने के लिए कैसे प्लास्टिक का इस्तेमाल हो रहा?
कोरोना से बचने के लिए मास्क, ग्लव्स, पीपीई किट या गाउन, फेस शील्ड या गॉगल्स लगाते हैं। ये सभी चीजें किसी न किसी तरह के प्लास्टिक से ही बनते हैं। इसमें भी चिंता की बात ये है कि ये सभी सिंगल यूज प्लास्टिक से बनते हैं। यानी एक बार इस्तेमाल करने के बाद इन्हें फेंकना ही पड़ता है।

कोरोना वार्ड में काम करने वाले डॉक्टर और हेल्थवर्कर्स को भी यही सलाह दी जाती है कि वो एक बार वार्ड से बाहर निकलने के बाद अपने सारे सेफ्टी इक्विपमेंट निकाल दें, ताकि संक्रमण को फैलने से रोका जा सके। यानी जितनी बार डॉक्टर या कोई हेल्थवर्कर्स वार्ड से बाहर आता है, तो अंदर जाने के लिए उसे दोबारा नए सेफ्टी इक्विपमेंट पहनने पड़ते हैं।

अस्पतालों या कोविड वार्ड से निकलने वाले मेडिकल वेस्ट को तो कलेक्ट कर लिया जाता है और उसे डिस्पोज भी कर दिया जाता है। लेकिन, चिंता की बात ये है कि जो आम लोग इनका इस्तेमाल करते हैं, उसको डिस्पोज कैसे किया जाए? पीपीई किट, ग्लव्स या मास्क को भले ही उतारकर कचरे में फेंक दिया जाए, लेकिन उससे संक्रमण फैलने का खतरा बना रहता है। इसमें भी पीपीई किट समुद्र के लिए और खतरनाक होती जा रही है, क्योंकि इसका वजन मास्क या ग्लव्स की तुलना में कहीं ज्यादा होता है। इस वजह से इससे चोक होने का खतरा है।

कोरोना से लड़ाई में काम आ रहे सेफ्टी इक्विपमेंट कैसे खतरनाक बन सकते हैं, इसको ऐसे भी समझ सकते हैं कि अप्रैल में वर्ल्ड वाइड फोरम फॉर नेचर की एक रिपोर्ट आई थी। इसमें कहा गया था कि अगर दुनियाभर से सिर्फ 1% मास्क को भी गलत तरीके से डिस्पोज किया जाता है तो भी हर महीने 1 करोड़ मास्क समुद्र में आ सकते हैं और इससे भयावह स्थिति बन सकती है। ऐसा इसलिए क्योंकि एक मास्क का वजन भले ही 4 ग्राम हो, लेकिन 1 करोड़ मास्क का वजन 40 हजार किलो हो जाता है।

कोरोना का मेडिकल वेस्ट समुद्र में गया, तो 450 साल लगेंगे नष्ट होने में
एक अनुमान के मुताबिक, सालाना 80 लाख टन प्लास्टिक समुद्र में जाता है। अगर इसे अभी कंट्रोल नहीं किया गया तो 2050 तक समुद्र में मछलियों से ज्यादा प्लास्टिक होगा।

वहीं, नेशनल जियोग्राफिक की एक रिपोर्ट के मुताबिक, प्लास्टिक की एक बोतल अगर समुद्र में चली जाती है, तो उसे नष्ट होने में कम से कम 450 साल का वक्त लगता है। ये प्लास्टिक की बोतलें पॉलीथिलीन टेरिफ्थेलैट यानी पीईटी प्लास्टिक से बनती हैं। इसी पीईटी प्लास्टिक से पीपीई किट, गाउन और फेस शील्ड भी बनते हैं।

क्या है इससे बचने का तरीका?
एक स्टडी बताती है कि कोरोना मरीजों के संपर्क में आने के 4 दिन बाद तक पीपीई किट पर वायरस जिंदा रह सकता है। लिहाजा, अस्पताल से निकलन वाले मेडिकल वेस्ट को कलेक्ट कर उसे रिसाइकल करने की सख्त जरूरत है।

इसके अलावा आम लोग प्लास्टिक से बने मास्क या सिंगल यूजेबल मास्क की जगह कपड़े से बने मास्क पहन सकते हैं। डब्ल्यूएचओ ने भी कहा है कि सभी स्वस्थ लोगों को कपड़े से बना मास्क पहनना चाहिए। ये मास्क तीन परतों वाला होना चाहिए। कपड़े से बने मास्क को दोबारा इस्तेमाल भी किया जा सकता है।

भारत से हर साल कितना प्लास्टिक कचरा निकलता है?
सीपीसीबी के देश के 60 बड़े शहरों में किए गए सर्वे में सामने आया था कि शहरों से रोजाना 4,059 टन प्लास्टिक कचरा निकलता है। इस आधार पर अनुमान लगाया गया था कि देशभर से रोजाना 25,940 टन प्लास्टिक कचरा निकलता है। इसमें से सिर्फ 60% यानी 15,384 टन प्लास्टिक कचरा ही एकत्रित या रिसाइकल किया जाता है। बाकी नदी-नालों के जरिए समुद्र में चला जाता है या फिर उसे जानवर खा लेते हैं।

इसके अलावा हर साल 1.5 लाख टन से ज्यादा प्लास्टिक कचरा विदेशों से भारत आता है। 2016-17 में 1.55 लाख टन प्लास्टिक कचरा विदेशों से आया था। वहीं, 2017-18 में 1.81 लाख टन और 2018-19 में 2.18 लाख टन प्लास्टिक कचरा आयात हुआ।

हर भारतीय सालाना 11 किलो प्लास्टिक इस्तेमाल करता है
फिक्की की फरवरी 2017 में आई एक रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत में हर व्यक्ति सालाना 11 किलोग्राम प्लास्टिक इस्तेमाल करता है। अमेरिका में इससे 10 गुना ज्यादा इस्तेमाल होता है। वहां हर व्यक्ति सालाना 109 किलोग्राम प्लास्टिक यूज करता है।

भारत की आबादी ज्यादा होने के कारण तकरीबन 5.5 लाख टन प्लास्टिक नदी-नालों से होते हुए समुद्र में मिल जाता है। नेचर कम्युनिकेशन की 2017 की रिपोर्ट के मुताबिक, सालाना 1.10 लाख टन प्लास्टिक कचरा गंगा से बहकर बंगाल की खाड़ी में मिल जाता है।

2017 में नेचर कम्युनिकेशन की एक रिपोर्ट आई थी। इस रिपोर्ट में कहा गया था कि हर साल 1.10 लाख टन प्लास्टिक कचरा गंगा नदी से बहकर बंगाल की खाड़ी में मिल जाता है।

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