पलायन के दर्द को बयां करता व्यंग्य, “बल हम तो सैर में रहते हैं”

पलायन के दर्द को बयां करता व्यंग्य, “बल हम तो सैर में रहते हैं”

मसूरी। बल हम तो सैर में रहते है, पर कैसे रहते है ये इन्होंने बताया। 8 सालो से लगातार विरासत पर काम कर रहे रेडियो खुशी 90.4 FM (GNFCS) मसूरी की बेहतरीन आवाज और अलग तरह से अपनी बोली पर पकड़ रखने वाली आर जे रोशनी खंडूरी और अपनी दमदार आवाज, बेहद आक्रामक और बेधड़क लेखन प्रतिभा वाले आर जे प्रदीप लिंगवाल ने पलायन पर न जाने कैसे कैसे बहाने बना कर घरो पर ताले जड़ कर भागने वालो वो आईना दिखाया है जो सत प्रतिशत सत्य लगता है।

बैजरो पौड़ी गढ़वाल के अखबार लोकल रिपोर्टर में छपे प्रदीप लिंगवाल के एक लेख को जब आर जे रोशनी खंडूरी ने अपनी प्रतिभा से विशुद्ध गढ़वाली टोन की हिंदी के साथ पेश किया तो लगा जैसे कि ये सब कोई हमारे घर पर आकर आँगन में बैठ कर चाय के गिलास के साथ बता रहा हो कि हम शहर में रहते है।

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ऐसा अक्सर हर गावँ में देखा गया है, गावँ से शहर की तरफ मुड़ा हर शख्स चाहे वो स्त्री पुरुष कोई भी हो गावँ में रहने वाले को सुनाता जरूर है। पर उसे नही पता होता कि जो वो सुना रहा है, वो कही न कही हर शहर के बाहरी दिखावे के अंदर की हकीकत को बता रहा है। 50 गज के अंदर सिमटी जिंदगी, पानी की कमी, कूड़ा कचरा, प्रदूषण, गर्मी, हर चीज खरीद कर ही उपयोग में लाना, मिलावट, अनजान लोगो का भय। और हर बार गावँ जाकर गावँ से सारी चीजे लाकर ये कहना कि क्या रखा है पहाड़ो में।

आधुनिक भेड़चाल और मैश अप कवर रीमिक्स से दूर इन दोनो आर जे की जुगलबंदी ने हमारे सामने वो पेश किया, जिसमे वो कुछ कहना चाहते थे पर बिना संस्कृति बचाने का झंडा लहराए, निस्वार्थ भाव से। अगर इस कहने में कोई मतलब छुपा होता तो ये फोटो प्रजेन्टेशन की वीडियो यूट्यूब पर होती। पर रेडियो खुशी और उनके आर जे का कुछ और ही मकसद था जिसमे वो पूरी तरह से कामयाब भी हुए।

यूट्यूब को छोड़ कर सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म फेसबुक से जब ये वीडियो अलग अलग जगह पोस्ट की गयी तो इतनी ज्यादा वायरल हो गयी, जिसका अंदाज़ा न प्रदीप को था न रोशनी को। सैकड़ो टिकटोक लिपसिंग वीडियो, हजार से ज्यादा शेयर और अलग अलग पेजो से या फेसबुक आईडी से लगभग 80 हजार, 70 हजार के पार गए व्यूज, बात को जन जन तक पहुचा गए।

कहीं-कहीं पर तो ऑरिजिनल वीडियो से वॉइस ओवर निकाल कर अपने तरीके से वीडियो बना कर पेश किया गया। जिस पर प्रदीप की प्रतिक्रिया थी कि हमारा मकसद अपनी बात पहुचाना था जो कि पूरा होता दिख रहा है, बाकी जिन्होंने अपने अंदाज़ अपने तरीके से पेश किया उसने भी हमारी बात ही रखी”! इस वीडियो में विशुद्ध हिंदी टोन के साथ गढ़वाली मिक्स करके अपनी आवाज देने वाली आर जे रोशनी का कहना था कि “विश्वास नही था कि मेरी थौलदार टिहरी की बोली के बावजूद इस बदले अख्खड़ श्रीनगरिया लहजे के शब्दो को लोग पसन्द करेंगे। सबका शुक्रिया”।

पूरी वीडियो के सार को दूसरी आवाज आर जे किरन कृशाली के चन्द शब्द समझा गए कि “गौं की खांण, गौं की छुईं लगाण पर गौं बोड़ी नि जाण”। फिलहाल जिनके पास अब तक ये शहरों की दास्तां नही पहुची, उनके लिए अब यूट्यूब का लिंक भी उपलब्ध है। तो देखिए और समझिये कि हम शहर में रहते है पर कैसे रहते है।

पलायन की मार पर चर्चा तब की जाती है जब गावँ के समीप नजदीकी कस्बे में 100 या 50 गज का घर बनाकर पुरखो की विरासत से अलविदा कह दिया जाता है। हां वही शहर या कस्बा जो किसी न किसी नदी का किनारा है, यानी उसका रंनिग चैनल। “रंनिग चैनल” मतलब 100 साल में एक बार अपने उस रास्ते पर पूरे उफान आती है, जो उसका सबसे पुराना रास्ता था।

जहां हमने अपने 50 गज के घरों से विकास की इबारत लिख दी। और ये इबारत सिर्फ उत्तराखंड नही बल्कि हर उस शहर का आखों देखा हाल है, जहां उत्तराखंड के रैबासी अलग अलग बहानो से जाकर बस गए, किसी ने बेहतर भविष्य का बहाना बनाया। किसी ने बच्चों की बेहतर शिक्षा का। किसी ने रोजगार का बहाना बनाया और किसी ने बेहतरीन लाइफ स्टाइल का।

और उस पर किया कटाक्ष बल हम तो सैर (शहर) में रहते है, इसलिए भी लोगो के जेहन में बसा है क्योंकि सबको लगता है कि जैसे वो उन्ही के मन की बात हो उन्ही के घर के हालात हो। बहरहाल जहां भी है वही से सुनिए और महसूस कीजिये एक अखबार के लेख को हकीकत की जमीन पर उतारती एक बेहतरीन आवाज।

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देखें वीडियो:

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