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Inspector Zende Movie Review: असली हीरो की सच्ची कहानी, जिसने मिशन इम्पॉसिबल को किया पॉसिबल

मनोज बाजपेयी की मच अवेटेड फिल्म 'इंस्पेक्टर जेंडे' आज ओटीटी प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स पर रिलीज हो गई है। फिल्म में मसाला है, रियल कहानी है और बहुत सारे इमोशन भी। ये फिल्म देखने लायक है या नहीं जानने के लिए पढ़ें पूरा रिव्यू।

Movie Review: ‘इंस्पेक्टर जेंडे’ सिर्फ एक क्राइम थ्रिलर नहीं, बल्कि एक सच्चे हीरो की कहानी है, जिसे पर्दे पर उतारा है शानदार अभिनेता मनोज बाजपेयी ने। फिल्म की कहानी एक रियल-लाइफ पुलिस अफसर इंस्पेक्टर जेंडे की है, जिसे देश के मोस्ट वांटेड अपराधी कार्ल भोजराज को पकड़ने की जिम्मेदारी दी जाती है। यह कहानी 1986 के उस दौर में ले जाती है, जब तकनीक सीमित थी और एक इंस्पेक्टर को अपनी समझ, साहस और ईमानदारी के बल पर एक अंतरराष्ट्रीय स्तर के अपराधी को पकड़ना होता है। चिनमय मंडलेकर के निर्देशन में बनी यह फिल्म रोमांच, इमोशन और हल्की-फुल्की कॉमेडी का बेहतरीन संतुलन है। मुंबई की चॉल से लेकर गोवा की गलियों तक फैली इस कहानी में न केवल एक पुलिस वाले की लगन दिखाई देती है, बल्कि उसकी निजी जिंदगी, पत्नी के साथ रिश्ते और देश के लिए भाव भी इसका हिस्सा हैं। फिल्म आज नेटफ्लिक्स पर रिलीज हो गई है। फिल्म कैसी है जानने के लिए स्क्रोल करें।

‘इंस्पेक्टर जेंडे’ की कहानी

कहानी शुरू होती मुंबई के चॉल से, जहां दूध लेने के लिए लाइन में लगे इंस्पेक्टर जेंडे को रेडियो के जरिए पता चलता है कि कार्ल भोजराज दिल्ली की तिहाड़ जेल से भाग गया है। ये सुनते ही इंस्पेक्टर जेंडे बिना दूध लिए वहां से भाग कर अपनी खोली में जाते हैं और सुबह सात बजे ही पुलिस थाने के लिए तैयार होकर निकल जाते हैं। उन्हें पहले से ही अंदाजा होता है कि थाने में उसके लिए फोन की घंटी बजने वाली है। वो जैसे ही थाने पहुंचता है, पता चलता है कि फोन खराब है। फोन ठीक होते ही इंस्पेक्टर जेंडे के पास एसीपी का फोन आता है और वो सीधे उनके दफ्तर पहुंचता है। इस केस के बारे में उससे जानकारी ली जाती है और सटीक बात सुनने के बाद उसे केस का हैंडओवर दे दिया जाता है और ठीक ऐसी ही उसकी चाहत भी होती है।

इंस्पेक्टर जेंडे के पास कार्ल भोजराज को पहले भी एक बार पकड़ने का अनुभव होता है और यही उसके लिए उम्मीद की करण के रूप में काम करता है। इंस्पेक्टर जेंडे को पूरा भरोसा होता है कि वो कार्ल भोजराज को आसानी पकड़ लेगा। दिल्ली से भागकर कार्ल भोजराज मुंबई आता है, जहां से मुंबई पुलिस को चकमा देकर वो गोवा पहुंचता है। उसकी नीयत साफ है, भारत से भागकर अमेरिका जाना, जहां उसकी अलग हो चुकी पत्नी रहती है। हमेशा लग्जरी लाइफ जीने वाला कार्ल अपना अंदाज बदलता है ताकि वो इंस्पेक्टर जेंडे को चकमा दे सके और इसी के सहारे वो कई दफे उसकी नजरों के सामने नौ-दो ग्यारह भी होता है।

इंस्पेक्टर जेंडे अपनी अलग टीम का गठन करते है और कार्ल की खोज में गोवा निकल पड़ता है, लेकिन उसके सामने बड़ी चुनोती है, एक तो ये कि ये मिशन एक सीक्रेट मिशन है, जिसे वो अपनी पत्नी के मना करने के बाद भी अंजाम दे रहा है और दूसरा ये कि उसे इस ऑपरेशन के दौरन गोवा पुलिस की कोई भी मदद नहीं लेनी, यहां तक कि उन्हें भनक भी नहीं लगने देनी है। बिना किसी को सूचित किए, साइलेंट अंदाज में इंस्पेक्टर जेंडे, कार्ल को कैसे पकड़ेगा? इस सवाल का जवाब इस फिल्म की कहानी आपको रोचक और मजेदार अंदाज में देगी। फिल्म में सस्पेंस के साथ लाइट कॉमेडी भी है, जो सधी हुई कहानी को सीरियस और बोरिंग नहीं होने देती। सच्ची घटना और रियल लाइफ किरदारों पर आधारित इस फिल्म की कहानी भले ही जगजाहिर है, लेकिन इसके बावजूद फिल्म में सस्पेंस है और मजा भी।

निर्देशन और लेखन

‘इंस्पेक्टर जेंडे’ निर्देशन और लेखन चिनमय मंडलेकर ने किया है। जैसा कि फिल्म की शुरुआत में ही बताया गया कि फिल्म असल घटना पर आधारित है, लेकिन इस रोमानी अंदाज में पेश किया गया है, यानी पूरी तरह मसाला मारकर दर्शकों के सामने लाया गया है। फिल्म की कहानी शुरू से लेकर अंत तक बांधे रखती है। फिल्म में हर किरदार को अच्चे से डेवलप किया गया है और हर किसी को कहानी के फ्लो के साथ बढ़ने का मौका मिला है। इंस्पेक्टर जेंडे के सहियोगी पुलिस अधिकारी पाटिल, जैकब, पाटेकर और अन्य के साथ ही चॉल मे रहने वाले जोशी अंकल जैसे हर किरदार को सही से रचा गया है। फिल्म की कहानी में फैक्ट्स के साथ इमोशन भी हैं, जो एक पुलिस वाले के देश के लिए प्यार और सम्मान को स्थापित करते हैं।

कहानी में पति-पत्नी के रिश्ते को भी सही तरीके से बुना गया है, जो कहानी हवा के झोके दे रहे हैं। इंस्पेक्टर जेंडे की पत्नी के साथ केमिस्ट्री दिल जीतने वाली है। फिल्म में कई सीन हैं, जो आपको गुदगुदाएंगे, खास तौर आखिर में कार्ल को पकड़ने के लिए शादी में अतरंगी डांस, लेकिन दो ऐसे सीन हैं, जो दिल जीत लेंगे, एक तो इंस्पेक्टर जेंडे की पत्नी का ऑपरेशन के दौरान एसीपी के पास जाकर पुरणपोली देना और बताया कि ये एनिवर्सरी के एवज में वो लाई है और चाहती है जहां भी उसका पति है, वहां पहुंचा दिया जाए। इसके अलावा एक और सीन, जहां गोवा में डिपार्टमेंट से मिले सारे पैसे खत्म होने की कागार पर होते हैं और ऐसे में इंस्पेक्टर जेंडे अपनी जेब से पैसा देकर कहता है कि वो कार्ल को लेकर ही जाएगा और ये सुनकर बाकी साथी भी अपनी जेब से छुट्टे पैसे निकाल कर देते हैं। ये कहा जा सकता है कि निर्देशन शानदार है, यही वजह है कि फिल्म उबाऊ नहीं लगती।

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‘इंस्पेक्टर जेंडे’ के तकनीकी पक्ष

फिल्म में गाने नहीं हैं, लेकिन बैकग्राउंड स्कोर काफी अच्छा है। इंस्पेक्टर जेंडे के पीछे चलता म्यूजिक दिमाग में बैठने वाला है। सिनेमैटोग्राफी भी शानदार की गई है। मुंबई का चॉल हो या जेडे को पहली बार पकड़ने वाले सीन में ऋषि कपूर का कटआउट जो ‘अमर अकबर एंथनी फिल्म’ का प्रतीत होता है, अच्छे तरीके से फिल्माया गया है। कहानी में गोवा के कोंकणी और इसाई समास का रहन सहन भी बैकग्राउंड में स्थापित होता दिख रहा है, जो ओल्ड गोवन वाइब दे रहा है। इसके अलावा फ्रेंच और पुर्तगाली कोलोनी की झलक भी पेश कर रहा है। एडिंग पर गहराई से काम किया गया है। लाइट येलो टोन फिल्म को उस दौर में ले जा रहा है, जिससे दर्शक 1986 के दौर से रिलेट कर पाएंगे।

कैसा है अभिनय

मनोज बाजपेयी एक शानदार एक्टर है, इसमें कोई दो राय नहीं है। फिल्म में इंस्पेक्टर जेंडे के रोल में उनका काम दिल जीतने वाला है। सही कॉमिक टाइमिंग और इमोशन दिखाने में वो कामयाब हुए हैं। हां उनकी बोली में मराठी टच आता तो कहानी को और ज्यादा बल मिलता, लेकिन उन्होंने अपनी हिंदी बोली के साथ भी किरदार के साथ जस्टिस किया है। मुंबई पुलिस पर लोगों के भरोसे को भी वो कहानी में कायम कर पाए हैं।

गिरिजा ओक, बेहद सहज और सुलझी हुई लगीं। उनका किरदार छोटा है, लेकिन इंस्पेक्टर जेंडे की पत्नी के रूप में वो जब भी स्क्रीन पर आती हैं तो उन पर से नजरें हटा पाना मुश्किल हो जाता है। गिरिजा ने सादगी और शर्मीले अंदाज से दिल जीता है। वो सिंपल भारतीय और पति प्रथा नारी के रोल में खूब जमी हैं, जिसकी आस्था भगवान में हद से ज्यादा है, ठीक वैसे ही जैसे आम भारती महिलाओं की होती, जो पति के घर से निकलने से पहले उनके लिए प्रार्थना करती हैं।

तीसरा और सबसे अहम करिदार जिम सर्भ का है, जो कार्ल भोजराज के रोल में हैं। उनके हाथ चंद डायलॉग ही आए हैं और वो अंग्रेजी में। उनका स्क्रीन टाइम थोड़ा ज्यादा होता तो कहानी को और बल मिलता, क्योंकि वो किरदार में बिल्कुल फिट बैठे हैं, लेकिन उन्हें अपनी प्रतिभा दिखाने का खास मौका नहीं मिल पाया है। वैसे ये कहानी कार्ल से ज्यादा जेंडे की है तो वही कहानी में छाए भी हुए हैं और कार्ल के ग्लैमर और चमचमाती जिंदगी हावी नहीं हो सकी है। एसीपी के रोल में सचिन खेजकर, भाओ कदम, हरीश दाऔड़े और सुमित चंद्रा का काम भी कमाल का है।

क्यों देखें ये फिल्म?

‘इंस्पेक्टर जेंडे’ को एक मौका जरूर मिलना चाहिए। कार्ल भोजराज की कहानी पहले भी कई बार पर्दे पर आ चुकी है, लेकिन ये पूरी तरह से इंस्पेक्टर जेंडे की कहानी है, एक रियल हीरो की, जो न्याय व्यवस्था का हिस्सा है, जिसकी कहानी दुनिया भर में पहुंचनी जरूरी है। फिल्म में मसाला है, इमोशन्स हैं और देशप्रेम भी, जो इस फिल्म को शानदार फिल्मों की श्रेणी में शामिल करते हैं। हम इस फिल्म को 3.5 स्टार दे रहे हैं।

  • फिल्म रिव्यू: इंस्पेक्टर जेंडे
  • स्टार रेटिंग: 3.5/5
  • पर्दे पर: 05/09/2025
  • डायरेक्टर: चिनमय मंडलेकर
  • शैली: क्राइम कॉमेडी ड्रामा

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