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Vadh 2 Review: दर्शकों के बीच लौटी दमदार अभिनय और गहरी सोच वाली थ्रिलर फिल्म ‘वध-2’

‘वध 2’ एक स्लो-बर्न थ्रिलर है, जो जेल, अपराध, नैतिकता और परिपक्व प्रेम की कहानी कहती है। संजय मिश्रा और नीना गुप्ता का दमदार अभिनय फिल्म की ताकत है, लेकिन धीमी रफ्तार और अनुमानित सस्पेंस इसे पूरी ऊंचाई तक नहीं पहुंचने देते।

Vadh 2 Movie Review : भले ही साल 2022 में आई फिल्म ‘वध’ बॉक्स ऑफिस पर कोई बड़ा कमाल नहीं दिखा पाई थी, लेकिन क्रिटिक्स और सिनेमा प्रेमियों के बीच उसे खासा सम्मान मिला था। गंभीर विषय, सशक्त अभिनय और अलग ट्रीटमेंट के कारण उस फिल्म ने अपनी एक अलग पहचान बनाई। ऐसे में इसके सीक्वल ‘वध 2’ से उम्मीदें स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती हैं। सवाल यही है कि क्या ‘वध 2’ भी उसी क्रिटिकल रास्ते पर आगे बढ़ती है या फिर यह दर्शकों को पूरी तरह संतुष्ट करने में चूक जाती है? जवाब थोड़ा मिला-जुला है। निर्देशक जसपाल सिंह संधू एक बार फिर एक ऐसी कहानी लेकर आए हैं, जो मुख्यधारा के सिनेमा से हटकर रिश्तों, नैतिकता, अपराध और कर्म के सिद्धांत को टटोलने की कोशिश करती है। ‘वध 2’ न तो पूरी तरह कमर्शियल मसाला फिल्म है और न ही शुद्ध आर्ट सिनेमा, बल्कि यह दोनों के बीच संतुलन बनाने का प्रयास करती एक स्लो-बर्न थ्रिलर है।

क्या है प्लॉट?

फिल्म की शुरुआत मंजू सिंह (नीना गुप्ता) के इंट्रोडक्शन से होती है, जिन्हें एक ऐसे जुर्म के लिए 28 साल की जेल और 25,000 रुपये का जुर्माना भुगतना पड़ता है, जो उन्होंने किया ही नहीं था। साल 1994 से शुरू हुई यह कहानी सीधे 28 साल आगे बढ़ती है, जहां मंजू अब भी जेल में सजा काट रही है। जेल की दीवारों के भीतर मंजू ने अपनी एक अलग दुनिया बना ली है, जहां वह दूसरी महिला कैदियों के साथ जीवन की कठोर सच्चाइयों को साझा करती है। इसी जेल में पुलिसवाला शंभूनाथ मिश्रा उर्फ शंभु (संजय मिश्रा) तैनात है। शंभु और मंजू के बीच एक अनकहा रिश्ता है, जो शारीरिक नहीं बल्कि भावनात्मक स्तर पर बेहद गहरा है। शंभु मंजू की छोटी-छोटी जरूरतों का ध्यान रखता है, जेल से सब्जियां चोरी कर बाहर बेचता है और नियमों की सीमाओं को लांघने से भी पीछे नहीं हटता। इन दोनों का रिश्ता फिल्म की सबसे मजबूत भावनात्मक कड़ी है।

कहानी में उथल-पुथल तब मचती है, जब कुख्यात अपराधी केशव उर्फ भूरी भैया (अक्षय डोगरा) जेल में दाखिल होता है। वह जेल परिसर में एक बूढ़े आदमी को बेरहमी से पीटता है और एक युवा महिला कैदी नैना कुमारी (योगिता बिहानी) पर भी बुरी नजर डालता है। केशव एक बड़े नेता का भाई है और जेल के अंदर पूरा सिस्टम उसके इशारों पर चलता है। पुलिसकर्मी और जेल प्रशासन उसकी सेवा में लगे रहते हैं। इन सब हरकतों से गुस्साए जेल अधीक्षक प्रकाश सिंह (कुमुद मिश्रा) एक रात केशव को ऐसा सबक सिखाते हैं, जिसके बाद कहानी पूरी तरह पलट जाती है। अगली सुबह केशव अचानक जेल से गायब हो जाता है। इस घटना के बाद पूरे सिस्टम में हड़कंप मच जाता है।

मामले की जांच के लिए सख्त इंस्पेक्टर अतीत सिंह (अमित के सिंह) को लाया जाता है। जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, सस्पेंस गहराता जाता है। लेकिन असली झटका तब लगता है, जब 11 महीने बाद शंभूनाथ मिश्रा के घर के पीछे केशव की कंकाल बनी लाश मिलती है। इसके बाद कहानी कई सवाल खड़े करती है, केशव की हत्या किसने की? इसके पीछे मकसद क्या था? और क्या सच सामने आ पाएगा?

कैसा है निर्देशन?

जसपाल सिंह संधू का निर्देशन ईमानदार है और उनकी मंशा साफ झलकती है। वह एक ऐसी थ्रिलर बनाना चाहते हैं, जो सिर्फ मनोरंजन न करे बल्कि दर्शक को सोचने पर मजबूर भी करे। फिल्म का पहला हाफ काफी स्लो है और कई जगहों पर कहानी जरूरत से ज्यादा खिंची हुई लगती है। हालांकि यह धीमापन किरदारों को समझने का मौका देता है, लेकिन आम दर्शकों के लिए यह थोड़ा भारी भी पड़ सकता है। इंटरवल के बाद फिल्म की गति पकड़ती है और सस्पेंस धीरे-धीरे खुलने लगता है। हालांकि, कहानी का कुछ हिस्सा पहले से अनुमानित हो जाता है, जिससे थ्रिल का असर थोड़ा कम हो जाता है। क्लाइमैक्स में निर्देशक एक मजबूत संदेश देने की कोशिश करते हैं, “जैसा बोओगे, वैसा काटोगे”, लेकिन अगर आखिरी खुलासा थोड़ा और चौंकाने वाला होता, तो फिल्म का प्रभाव कहीं ज्यादा गहरा हो सकता था।

कैसा अभिनय?

‘वध 2’ पूरी तरह से अपने अनुभवी कलाकारों के दम पर आगे बढ़ती है। संजय मिश्रा एक बार फिर साबित करते हैं कि वह साइलेंट इंटेंस परफॉर्मेंस के मास्टर हैं। शंभूनाथ मिश्रा के किरदार में उनका शांत स्वभाव, भीतर छिपा प्रेम और अपराधबोध दर्शकों को प्रभावित करता है। इतनी दबाव भरी परिस्थितियों में भी उनका संयम देखने लायक है।

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नीना गुप्ता मंजू सिंह के किरदार में कोई बड़ा नाटकीय प्रदर्शन नहीं करतीं, लेकिन उनकी सादगी और भावनात्मक गहराई उन्हें एक ‘असाधारण नारी’ के रूप में पेश करती है। संजय और नीना की ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री बिना किसी रोमांटिक दिखावे के भी बेहद प्रभावी लगती है। इनके रिश्ते में सम्मान और समझ साफ नजर आती है।

कुमुद मिश्रा की परफॉर्मेंस शुरुआत में काफी मजबूत लगती है, लेकिन कहानी की डिमांड के चलते उनका ग्राफ अचानक गिरता हुआ महसूस होता है, जिसे स्वीकार करना थोड़ा मुश्किल है। इसके बावजूद, वह अपने किरदार के साथ न्याय करते हैं। अक्षय डोगरा कम स्क्रीन टाइम में भी एक खतरनाक अपराधी के रूप में असर छोड़ते हैं। योगिता बिहानी, शिल्पा शुक्ला और अमित के सिंह अपने-अपने किरदारों में ईमानदार नजर आते हैं।

तकनीकी पक्ष

फिल्म की सिनेमैटोग्राफी (सपन नरूला) साधारण लेकिन प्रभावी है। जेल का माहौल वास्तविक लगता है, जो कहानी की गंभीरता को मजबूत करता है। हालांकि एडिटिंग (भरत एस रावत) में थोड़ी कसावट की कमी महसूस होती है, खासकर सेकंड हाफ में जहां कुछ सीन खिंचे हुए लगते हैं। म्यूजिक (रोचक कोहली) फिल्म पर कोई खास छाप नहीं छोड़ पाता, लेकिन बैकग्राउंड स्कोर (अद्वैत नेम्लेकर) सस्पेंस बनाए रखने में मदद करता है और कहानी के साथ अच्छे से घुलमिल जाता है।

कमियां- प्रेडिक्टेबिलिटी और अधूरी परतें

फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी प्रेडिक्टेबल कहानी और धीमी रफ्तार है। कुछ किरदारों की बैकस्टोरी और परिस्थितियों को और गहराई से दिखाया जा सकता था, जिससे भावनात्मक जुड़ाव और मजबूत होता। कई सिचुएशंस बिना ठोस बैकग्राउंड के अधूरी सी लगती हैं, जिन्हें शायद भविष्य के किसी पार्ट में एक्सप्लोर किया जाए।

निष्कर्ष: देखनी चाहिए या इंतजार करें?

‘वध 2’ हर दर्शक के लिए नहीं बनी है। अगर आप तेज-तर्रार एक्शन, मसालेदार ड्रामा या हल्का मनोरंजन चाहते हैं तो यह फिल्म आपको थका सकती है, लेकिन अगर आप संजय मिश्रा और नीना गुप्ता के फैन हैं या फिर गंभीर विषयों और परिपक्व प्रेम कहानियों में रुचि रखते हैं तो यह फिल्म आपको कुछ हद तक संतुष्ट करेगी।

फिल्म यह साबित करती है कि प्रेम सिर्फ शारीरिक रिश्तों तक सीमित नहीं होता और उम्र या हालात उसकी गहराई को कम नहीं कर सकते। हालांकि मजबूत विचार और दमदार अभिनय के बावजूद कमजोर रफ्तार और अनुमानित सस्पेंस ‘वध 2’ को पूरी तरह ऊंचाई तक नहीं पहुंचने देता। इन सब कारणों से ‘वध 2’ एक औसत लेकिन सोचने पर मजबूर करने वाली थ्रिलर बनकर सामने आती है, जो 2.5 स्टार की हकदार है।

  • फिल्म रिव्यू : वध 2
  • स्टार रेटिंग : 2.5/5
  • पर्दे पर : 06/02/2026
  • डायरेक्टर : जसपाल सिंह संधू
  • शैली : क्राइम थ्रिलर और ड्रामा

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