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पश्चिमी देशों के दबाव पर BRICS का करारा जवाब, अंजाम तक पहुंचेगी 2022 में शुरू हुई कहानी?

2022 में रूस पर पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद BRICS देशों ने अमेरिकी दबाव के खिलाफ एकजुट होकर जवाब दिया। डॉलर पर निर्भरता घटाने, आपसी व्यापार बढ़ाने और वैश्विक सत्ता संतुलन को बहुपक्षीय बनाने की दिशा में BRICS तेजी से कदम बढ़ा रहा है, जो एक नया वैश्विक अध्याय लिख सकता है।

नई दिल्ली। वैश्विक मंच पर पिछले कुछ दिनों से एक नया इतिहास रचा जा रहा है। BRICS यानी कि ब्राजील, रूस, भारत, चीन और साउथ अफ्रीका ने पश्चिमी देशों के दबाव के खिलाफ एकजुट होकर दुनिया को चौंका दिया है। ये देश, जो पहले अपनी आपसी मतभेदों की वजह से अलग-थलग दिखते थे, अब एक साथ मिलकर पश्चिमी दुनिया के सामने एक मजबूत ताकत बनकर उभरे हैं। ये कोई साधारण कूटनीतिक कदम नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और सत्ता के समीकरण को बदलने वाला एक बड़ा परिवर्तन है। आइए, इस ऐतिहासिक मोड़ की पूरी कहानी को समझने की कोशिश करते हैं।

2022 में रूस के साथ शुरू हुई थी कहानी

पिछले कुछ सालों में पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका और यूरोपीय संघ ने BRICS देशों पर तरह-तरह का दबाव बनाया। 2022 में रूस के लगभग 300 अरब डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार को पश्चिमी देशों ने जब्त कर लिया, जिससे पूरी दुनिया में हड़कंप मच गया। इससे ग्लोबल साउथ यानी कि विकासशील देशों को एक बड़ा झटका लगा और उन्हें एहसास हुआ कि पश्चिमी देशों में उनकी संपत्तियां सुरक्षित नहीं हैं। इस घटना ने BRICS देशों को एक नई दिशा दी और उन्होंने अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने की मुहिम, यानी ‘डी-डॉलराइजेशन’, को तेज कर दिया।

चीन और भारत पर लगाए भारी-भरकम टैरिफ

अमेरिका ने इसी बीच चीन के खिलाफ अपनी व्यापारिक जंग को और तेज किया, जिसमें चीनी सामानों पर भारी-भरकम टैरिफ लगाए गए। जवाब में, चीन ने भी अमेरिका के खिलाफ उसी तरह के कदम उठाए। इसके अलावा, अमेरिका ने भारत पर रूसी तेल खरीदने के लिए पहले 25 फीसदी और फिर 50 फीसदी टैरिफ थोप दिया, जबकि पहले उसने भारत को वैश्विक बाजार को स्थिर करने के लिए रूस से तेल खरीदने के लिए प्रोत्साहित किया था। ब्राजील पर भी 50 फीसदी टैरिफ लगाया गया, जिसके जवाब में ब्राजील के राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा ने साफ कहा कि उनका देश इस ‘सजा’ को चुपचाप बर्दाश्त नहीं करेगा।

साउथ अफ्रीका और ब्राजील को भी दी धमकी

साउथ अफ्रीका के खिलाफ अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने एक रिपोर्ट जारी की, जिसमें वहां नस्लीय अल्पसंख्यकों के अधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाया गया। साउथ अफ्रीका ने इसकी कड़ी आलोचना की और इसे ‘विरोधाभासी’ करार दिया। इसके अलावा, NATO के प्रमुख ने भारत, चीन और ब्राजील को धमकी दी कि वे यूक्रेन मुद्दे पर रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से बात करें, वरना प्रतिबंधों का सामना करना पड़ेगा। यूरोपीय संघ ने भी भारत पर रूसी तेल न खरीदने का दबाव बनाया, जबकि वह खुद रूस से ऊर्जा संसाधनों का आयात कर रहा है।

चीन और भारत पर लगाए भारी-भरकम टैरिफ

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अमेरिका ने इसी बीच चीन के खिलाफ अपनी व्यापारिक जंग को और तेज किया, जिसमें चीनी सामानों पर भारी-भरकम टैरिफ लगाए गए। जवाब में, चीन ने भी अमेरिका के खिलाफ उसी तरह के कदम उठाए। इसके अलावा, अमेरिका ने भारत पर रूसी तेल खरीदने के लिए पहले 25 फीसदी और फिर 50 फीसदी टैरिफ थोप दिया, जबकि पहले उसने भारत को वैश्विक बाजार को स्थिर करने के लिए रूस से तेल खरीदने के लिए प्रोत्साहित किया था। ब्राजील पर भी 50 फीसदी टैरिफ लगाया गया, जिसके जवाब में ब्राजील के राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा ने साफ कहा कि उनका देश इस ‘सजा’ को चुपचाप बर्दाश्त नहीं करेगा।

साउथ अफ्रीका और ब्राजील को भी दी धमकी

साउथ अफ्रीका के खिलाफ अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने एक रिपोर्ट जारी की, जिसमें वहां नस्लीय अल्पसंख्यकों के अधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाया गया। साउथ अफ्रीका ने इसकी कड़ी आलोचना की और इसे ‘विरोधाभासी’ करार दिया। इसके अलावा, NATO के प्रमुख ने भारत, चीन और ब्राजील को धमकी दी कि वे यूक्रेन मुद्दे पर रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से बात करें, वरना प्रतिबंधों का सामना करना पड़ेगा। यूरोपीय संघ ने भी भारत पर रूसी तेल न खरीदने का दबाव बनाया, जबकि वह खुद रूस से ऊर्जा संसाधनों का आयात कर रहा है।

ग्लोबल इकोनॉमी में नया मोड़ है डी-डॉलराइजेशन

BRICS देशों का सबसे बड़ा कदम है अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करना। ये देश अब अपने स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा दे रहे हैं। उदाहरण के लिए, भारत और रूस के बीच तेल का व्यापार रुपये में हो रहा है, जबकि चीन और रूस ने अपने 80 फीसदी व्यापार को रूबल और युआन में निपटाना शुरू कर दिया है। BRICS ने अपनी न्यू डेवलपमेंट बैंक और BRICS पे जैसे सिस्टम को मजबूत करने की दिशा में काम शुरू किया है, ताकि SWIFT जैसे पश्चिमी वित्तीय तंत्र से बच सकें। हालांकि, एक्सपर्ट्स का मानना है कि डॉलर का दबदबा जल्दी खत्म नहीं होगा, क्योंकि यह अभी भी वैश्विक व्यापार का 80% हिस्सा संभालता है। फिर भी, BRICS वैश्विक अर्थव्यवस्था को और समावेशी बनाने की दिशा में तेज से बढ़ रहा है।

क्यों ऐतिहासिक माना जा रहा BRICS का ये उभार?

BRICS अब सिर्फ एक आर्थिक गठजोड़ नहीं, बल्कि एक ऐसी ताकत बन चुका है, जो पश्चिमी देशों के एकध्रुवीय विश्व को चुनौती दे रहा है। ये देश एक मल्टीपोलर वर्ल्ड की दिशा में काम कर रहे हैं, जहां कोई एक देश पूरी दुनिया पर हावी न हो। भारत, रूस, चीन, ब्राजील और साउथ अफ्रीका की यह एकता न केवल उनकी संप्रभुता की रक्षा कर रही है, बल्कि ग्लोबल साउथ के अन्य देशों को भी प्रेरित कर रही है। BRICS की यह एकता वैश्विक व्यापार, कूटनीति और अर्थव्यवस्था में बड़े बदलाव ला सकती है। अब देखना यह है कि क्या BRICS देश अपनी एकजुटता से इस कहानी को अंजाम तक पहुंचा पाते हैं या नहीं।

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