Ajab-GajabBreaking NewsNationalWorld

चंद्रमा से टकराया अंतरिक्ष में तैर रहे स्पेस-एक्स रॉकेट का एक टुकड़ा, इतने हजार किलो है वजन

अंतरिक्ष में आज एक ऐसी हलचल हुई है, जिसकी चर्चा हर तरफ हो रही है। अंतरिक्ष में तैर रहे स्पेस-एक्स रॉकेट का एक टुकड़ा आज चंद्रमा से टकरा गया है।

SpaceX Launches Rocket : बीते साल से अंतरिक्ष में तैर रहे स्पेस-एक्स रॉकेट का टुकड़ा आज यानी बुधवार, 5 अगस्त को चंद्रमा से टकराया। इसका आकार स्कूल-बस के जितना बड़ा और वजन करीब 4,000 किलोग्राम का है। स्पेस-एक्स रॉकेट का यह टुकड़ा, स्पेस एक्स फैल्कन-9 रॉकेट का दूसरा हिस्सा है, जिसे जनवरी 2025 में लूनर लैंडर को चंद्रमा की ओर भेजा गया था।

भारतीय समय के हिसाब से आज यानी बुधवार दोपहर 12 बजकर 5 मिनट पर चांद से उसकी यह टक्कर हुई है। कहा जा रहा था कि इस टक्कर से चंद्रमा की सतह पर धूल का गुबार उठेगा, जो सूरज की रोशनी में चमकेगा लेकिन इसे धरती से नंगी आंखों से देखना मुश्किल होगा।

आज चांद पर बड़ा धमाका

कहा जा रहा है कि इस रॉकेट के टुकड़े के चांद से टकराने से वहां (चंद्रमा) एक गड्ढा (क्रेटर) बन गया है। वैज्ञानिक इसे और जानने के एक मौके के तौर पर देखते हैं कि कैसे कृत्रिम वस्तुएं खगोलीय पिंडों से टकराती हैं, और साथ ही अंतरिक्ष के मलबे पर नज़र रखने की कोशिशों को तेज़ करने के अवसर के रूप में भी।

वैज्ञानिकों और हजारों आम लोग भी इस घटना को देखने के लिए उत्सुक थे। कहा जा रहा है कि पृथ्वी के लिए चिंता की कोई बात नहीं है, क्योंकि इस टक्कर से यहां कोई खतरा नहीं है। हालांकि इसे पृथ्वी से नंगी आंखों (बिना किसी इक्विपमेंट) से देखना मुश्किल था।

घटना को नंगी आंखों से नहीं देखा जा सका

द गार्डियन की रिपोर्ट के अनुसार, इस रॉकेट ने जनवरी 2025 में फायरफ्लाई एयरोस्पेस के लूनर लैंडर को चंद्रमा की ओर भेजा था, जो भारतीय समयानुसार बुधवार को दोपहर लगभग 12.05 बजे चंद्रमा की सतह से 8,690 किमी/घंटा की रफ्तार से टकराया।  हालांकि ये बात पहले ही कही गई थी कि रॉकेट के इस टुकड़े के चंद्रमा के पश्चिमी किनारे पर मौजूद आइंस्टीन क्रेटर से टकराने की उम्मीद है, इसी वजह से इसे पृथ्वी से देखना मुश्किल होता है।

धरती पर क्यों नहीं गिरा रॉकेट का टुकड़ा

आप ये सोच रहे होंगे कि रॉकेट का यह हिस्सा धरती पर क्यों नहीं गिरेगा। दरअसल रॉकेट के इन अलग-अलग हिस्सों को ‘स्टेज’ कहा जाता है, जो आमतौर पर रॉकेट के पेलोड को कक्षा में सही जगह पर पहुंचाने के बाद ये स्टेज पृथ्वी के वायुमंडल में वापस गिरकर जल जाते हैं या समुद्र में गिर जाते हैं। लेकिन 2025 के लूनर लैंडर मिशन के लिए पृथ्वी के पास वाले मिशनों की तुलना में ज्यादा जोर (थ्रस्ट) की जरूरत थी, इसलिए रॉकेट का दूसरा चरण अंतरिक्ष में ही रह गया और यह हजारों मलबे के टुकड़ों के बीच बिना किसी निश्चित दिशा के तैरता रहा।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button