उत्तराखंड में जीवन भक्षक बनी फर्जी जीवन रक्षक दवाओं पर रोक लगाने की संयुक्त नागरिक संगठन ने की मांग
ईमेल से भेजे पत्रों में कहा है कि फर्जी दवाइयों के विक्रेता रातों रात धन कुबेर बनने के लालच में मरीजों की जान की कीमत पर ये अपराध कर रहे हैं। ये लोग 20 प्रतिशत की जगह 10 गुना फायदे के लिए जहां जीएसटी के करोड़ो रुपए की चोरी कर रहे हैं, वहां खड़िया मिट्टी और चूना मिलाकर प्रतिष्ठित दवा कंपनियों के लेवल में बेचकर मरीजों को राहत की जगह मौत के मुंह में धकेल रहे हैं।

देहरादून। संयुक्त नागरिक संगठन ने उत्तराखंड में जीवन भक्षक बनी फर्जी जीवन रक्षक दवाओं पर रोक लगाने की मांग की है। संगठन ने प्रधानमंत्री, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा, मुख्यमंत्री धामी, स्वास्थ्य मंत्री सुबोध उनियाल एवं स्वास्थ्य सचिव आदि को भेजे पत्रों में फर्जी दवाओं पर रोक लगाने हेतु पूर्व में बने औषधि एवं सौंदर्य प्रसाधन अधिनियम 1940 की जगह जनहित में दो साल से प्रस्तावित/लंबित औषधि, चिकित्सा उपकरण और सौंदर्य प्रसाधन अधिनियम 2025 को संसद सत्र में लाकर तत्काल लागू करने की मांग की है।
पत्र में लिखा गया है कि देहरादून ईस्ट होप टाउन क्षेत्र में गाजियाबाद क्राइम ब्रांच तथा खाद्य सुरक्षा औषधि विभाग की टीमों द्वारा पकड़ी गई नकली दवा फैक्ट्री के मालिकों, संचालकों, संबंधित थोक व फुटकर विक्रेताओं के गिरोह को आमजन सलाखों के पीछे देखना चाहता है।
संयुक्त नागरिक संगठन के सचिव सुशील त्यागी ने बताया है कि दून के सहसपुर क्षेत्र में पकड़ी गई नकली दवा फैक्ट्री में प्रतिष्ठित दवा कंपनियों तथा सिप्ला, ल्यूपिन, डॉ. रेडिज, सनफार्मा, मैनकाइंड, इंटास, एबार एवं जायडस, जैसी प्रतिष्ठित कंपनियों के नकली लेवल, रैपर, पैकिंग सामग्री, निर्माण की मशीन तथा बोरियो में भरी टैबलेट्स कैप्सूल्स आदि पकड़े गए हैं लेकिन गुनाहगार नहीं पकड़े गए।
आम जन में चर्चा का विषय है की इस छापेमारी की पूर्व सूचनाएं इनको मिल गई होंगी। क्योंकि ड्रग माफियाओं के स्रोत संत्री, मंत्री, जंत्री सभी जगह हो सकते हैं जो इनको संरक्षण प्रदान करते हैं। अन्यथा मौत के ये सौदागर पकड़े क्यों नहीं जाते हैं। बताया गया है कि विगत अवधि में गुड़गांव, दिल्ली, लखनऊ, गोरखपुर, नोएडा, गाजियाबाद आदि क्षेत्रों में भी नकली दवाइयों के गोदाम व दुकान आदि पर फर्जी दवाइयों का बहुतायत में मिलना साबित करता है कि देशभर में इनका एक बड़ा नेटवर्क स्थापित हो गया है और केंद्र तथा राज्य सरकारें इन पर रोक लगाने में असफल साबित हुई है। ज्यों-ज्यों दवा की मर्ज़ की, ये बढ़ता ही गया।
ईमेल से भेजे पत्रों में कहा है कि फर्जी दवाइयों के विक्रेता रातों रात धन कुबेर बनने के लालच में मरीजों की जान की कीमत पर ये अपराध कर रहे हैं। ये लोग 20 प्रतिशत की जगह 10 गुना फायदे के लिए जहां जीएसटी के करोड़ो रुपए की चोरी कर रहे हैं, वहां खड़िया मिट्टी और चूना मिलाकर प्रतिष्ठित दवा कंपनियों के लेवल में बेचकर मरीजों को राहत की जगह मौत के मुंह में धकेल रहे हैं।बीपी के मरीजों की दवा एमरिल एम टैबलेट भी नकली मिल रही है। सवाल किया गया है कि बीमारों को बचाएगा कौन, डॉक्टर या दवाइयां?
त्यागी के अनुसार सेफ ड्रग्स सेफ लाइफ़ अभियान में देहरादून के सहसपुर क्षेत्र के दवा विक्रेताओं पर छापामार करवाई से पहले संभावित गुनहगारों ने अपने शटर ही बंद कर दिए। जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के छापो में भी में एक्सपायरी दवाई तथा इंजेक्शन पाए गए हैं। अंत में औषधि एवं सौंदर्य प्रसाधन अधिनियम 1940 की जगह जनहित में दो साल से प्रस्तावित/लंबित औषधि, चिकित्सा उपकरण और सौंदर्य प्रसाधन अधिनियम 2025 को संसद सत्र में लाकर तत्काल लागू करने की मांग की गई है।




