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मेडिकल कॉलेजों में एडमिशन के लिए फर्जी प्रमाणपत्रों के इस्तेमाल का आरोप, एसआईटी ने शुरू की जांच

उत्तराखंड के मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस दाखिलों से जुड़े कथित फर्जी प्रमाणपत्र मामले की जांच तेज हो गई है। देहरादून पुलिस की एसआईटी ने स्वतंत्रता सेनानी आश्रित प्रमाणपत्रों में कथित धोखाधड़ी की जांच शुरू कर दी है और इस संबंध में दो मुकदमे दर्ज किए गए हैं।

देहरादून। उत्तराखंड के मेडिकल कॉलेजों के एमबीबीएस कोर्स में दाखिला लेने में स्वतंत्रता सेनानी आश्रित होने से जुड़े फर्जी सर्टिफिकेट्स के इस्तेमाल के आरोपों की जांच देहरादून पुलिस की एसआईटी ने शुरू कर दी है। इस मामले में दो अलग-अलग थानों में भी मुकदमे दर्ज किए गए हैं। एसपी (देहात) जया बलूनी ने बताया कि जहां एमबीबीएस में दाखिला लेने में स्वतंत्रता सेनानी आश्रित होने के कथित फर्जी सर्टिफिकेट्स के इस्तेमाल की बात सामने आई है, वहां संबंधित दस्तावेज संबंधित अधिकारियों और विभागों से मांगे गए हैं। जब उनसे पूछा गया कि क्या इस मामले में किसी संगठित गिरोह की भूमिका हो सकती है, तो उन्होंने कहा कि जांच अभी प्रारंभिक चरण में है इसलिए अभी ऐसा निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगा।

मामले की जांच कर रही एसपी ने और क्या बताया

कथित तौर पर फर्जी अधिवास प्रमाणपत्रों (Domicile Certificates) के इस्तेमाल की जांच की मांग के संबंध में पुलिस अधीक्षक ने कहा कि फिलहाल दर्ज दोनों मामले स्वतंत्रता सेनानी आश्रित होने के प्रमाणपत्रों से जुड़ी कथित धोखाधड़ी और उनके आधार पर प्राप्त दाखिलों से संबंधित हैं। उन्होंने कहा कि एसआईटी फिलहाल इसी पहलू की जांच कर रही है। पत्रकार प्रदीप बहुगुणा, जिन्होंने इस मामले को उजागर किया था, ने अब मेडिकल दाखिलों में इस्तेमाल किए गए अधिवास प्रमाणपत्रों की व्यापक जांच की मांग की है। बहुगुणा ने दावा किया कि स्वतंत्रता सेनानी आश्रित होने से संबंधित प्रमाणपत्रों की जांच के दौरान कुछ अभ्यर्थियों के अधिवास संबंधी दस्तावेजों को लेकर भी सवाल उठे थे। उन्होंने आरोप लगाया कि स्वतंत्रता सेनानी आश्रित होने से जुड़े प्रमाणपत्रों से संबंधित मामलों में प्राथमिकी दर्ज की गई है, लेकिन कथित फर्जी अधिवास प्रमाणपत्रों के इस्तेमाल के संबंध में अलग से कोई जांच या कार्रवाई नहीं की गई है।

बहुगुणा ने कहा कि राज्य कोटे के तहत एमबीबीएस सीट के लिए अधिवास एक महत्वपूर्ण पात्रता मानदंड है और विभिन्न आरक्षित श्रेणियों तथा उप-श्रेणियों से जुड़े लाभ केवल निर्धारित पात्रता मानदंड पूरे करने पर ही दिए जाते हैं। उन्होंने एक अन्य मामले का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि सौम्या नाम की एक अभ्यर्थी को शुरुआत में देहरादून के दून मेडिकल कॉलेज में ‘अनुसूचित जाति-अनाथ’ श्रेणी के तहत सीट आवंटित की गई थी। बहुगुणा के अनुसार, बाद में डोईवाला तहसील स्तर पर उसका जाति प्रमाणपत्र रद्द किए जाने के बाद देहरादून में उसका दाखिला नहीं हो सका। उन्होंने दावा किया कि बाद में उसी अभ्यर्थी को हल्द्वानी में ‘सामान्य-अनाथ’ श्रेणी के तहत सीट आवंटित की गई। बहुगुणा ने आवंटन प्रक्रिया और अभ्यर्थी की पात्रता पर सवाल उठाते हुए इस मामले में जांच की मांग की है।

चिकित्सा शिक्षा मंत्री एक सप्ताह के अंदर मांगी रिपोर्ट 

इसके पहले उत्तराखंड के चिकित्सा शिक्षा मंत्री सुबोध उनियाल ने मेडिकल कॉलेजों में दाखिले के लिए अधिवास और स्वतंत्रता सेनानी आश्रित होने से जुड़े फर्जी प्रमाणपत्रों के इस्तेमाल के आरोपों की जांच करने का निर्देश देहरादून के जिलाधिकारी को दिया और एक सप्ताह के अंदर रिपोर्ट सौंपने को कहा था। इस मुद्दे को सामने लाने वाले सामाजिक कार्यकर्ता प्रदीप बहुगुणा ने शुक्रवार को राज्य के स्वास्थ्य और चिकित्सा शिक्षा मंत्री उनियाल से मुलाकात की और लगभग 350 अभ्यर्थियों की एक लिस्ट सौंपते हुए उनके सर्टिफिकेट्स की विस्तृत जांच की मांग की। बहुगुणा ने साफ किया कि वह लिस्ट में शामिल सभी अभ्यर्थियों के सर्टिफिकेट्स फर्जी होने का दावा नहीं कर रहे हैं लेकिन उपलब्ध रिकॉर्ड और दाखिले से जुड़ी जानकारियों पर संदेह होने के चलते उनके दस्तावेजों की जांच की मांग कर रहे हैं।

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उनियाल ने कहा कि सरकार इस मामले को गंभीरता से ले रही है। उनियाल ने कहा कि सरकार ने देहरादून के जिलाधिकारी को जांच करने और एक हफ़्ते के अंदर रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया है। यह मामला इसलिए अहम हो गया है क्योंकि राज्य में अभी मेडिकल कॉलेज में दाखिले के लिए काउंसलिंग की प्रक्रिया चल रही है। बहुगुणा ने बताया कि 350 अभ्यर्थियों में से अनेक ने अपनी हाईस्कूल और 12वीं की पढ़ाई उत्तराखंड के बाहर की है जबकि कुछ बिहार, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) में सम्मिलित हुए। हालांकि, किसी दूसरे राज्य में पढ़ाई करने या अन्य राज्य में नीट में शामिल होने से ही यह साबित नहीं हो जाता कि प्रमाणपत्र नकली हैं।

कैसे सामने आया मामला?

बहुगुणा के अनुसार, यह मामला ‘स्वतंत्रता सेनानी के आश्रित’ श्रेणी के तहत आवेदन करने वाले कुछ अभ्यर्थियों के दस्तावेजों की जांच के दौरान सामने आया। उन्होंने बताया कि संबंधित अभ्यर्थियों और उनके प्रमाणपत्र नंबरों की सूची वेबसाइट पर उपलब्ध थी। बहुगुणा ने कहा कि ऑनलाइन रिकॉर्ड के साथ सत्यापन के दौरान कुछ प्रमाणपत्रों के नंबर पोर्टल पर नहीं मिले, जबकि एक मामले में दर्ज प्रमाणपत्र या आवेदन संख्या किसी दूसरे व्यक्ति से जुड़ी पाई गई। उन्होंने दावा किया कि एक मामले में ऑनलाइन आवेदन की स्थिति ‘पेंडिंग’ दिख रही थी, जबकि उस अभ्यर्थी को पहले ही मेडिकल सीट आवंटित की जा चुकी थी।

हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है। देहरादून प्रशासन ने 17 सितंबर को कई कॉमन सर्विस सेंटर्स (सीएससी) का औचक निरीक्षण किया। जिलाधिकारी आशीष चौहान के निर्देशों पर कार्रवाई करते हुए, अधिकारियों ने अनियमितताएं पाए जाने के बाद चार सीएससी केंद्रों को सील कर दिया और कुछ कंप्यूटर व लैपटॉप जब्त कर लिए। देहरादून में सीएससी ऑपरेटर रोहित नेगी ने ‘पीटीआई भाषा’ को बताया कि सीएससी की भूमिका आम तौर पर ऑनलाइन आवेदन भरने और पोर्टल पर दस्तावेज अपलोड करने तक ही सीमित होती है। उन्होंने बताया कि इसके बाद, आवेदन सरकारी तंत्र से होकर गुजरता है। उन्होंने स्थायी निवास प्रमाणपत्र का उदाहरण देते हुए कहा कि इन आवेदनों के मामलों में, तहसील, राजस्व अधिकारियों या पटवारी के स्तर पर जांच के बाद सक्षम अधिकारी की मंज़ूरी से दस्तावेज़ जारी किया जाता है।

स्वास्थ्य मंत्री उनियाल ने कहा कि जांच में न सिर्फ प्रमाणपत्र का इस्तेमाल करने वाले व्यक्ति की भूमिका देखी जाएगी, बल्कि यह भी पता लगाया जाएगा कि उसे जारी करने की प्रक्रिया के किस चरण में गड़बड़ी हुई। उनियाल ने इस मामले के पीछे किसी बड़े गिरोह के होने की संभावना की ओर भी इशारा किया । उनियाल ने कहा कि अगर कोई अभ्यर्थी जाली प्रमाणपत्र के आधार पर दाखिला लेता है और बाद में धोखाधड़ी साबित हो जाती है, तो दाखिला रद्द करने जैसी कार्रवाई की जा सकती है । उनके अनुसार, शुरुआती जांच से पता चला है कि कुछ प्रमाणपत्र फर्जी थे और अधिवास प्रमाणपत्र के बारे में भी शिकायतें मिली हैं।

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