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Uttarakhand Disaster : आपदा से बेघर हुए परिवार, मानसून बीता तो भूल गए नेता-अफसर

अगस्त में बागेश्वर जिले के जाख-हड़बाड़ गांव में बारिश से भारी तबाही हुई। नौ परिवारों के घर, खेत बर्बाद हो गए। शुरू में नेताओं और अधिकारियों ने ध्यान दिया लेकिन तीन महीने बाद गांव वाले पूरी तरह से उपेक्षित हैं और अपना हाल पर आंसू बहा रहे हैं।

बागेश्वर। राज्य स्थापना की रजत जयंती के उत्सवों के बीच जरा जाख हडबाड़ के आपदा प्रभावितों का दर्द भी महसूस कर लीजिए। मानूसनकाल में बागेश्वर जिले के इस गांव के ऊपर आसमान से बेहिसाब आफत बरसी। खूब शोर मचा तो केंद्रीय मंत्री अजय टम्टा, नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य से लेकर केंद्रीय टीम के पर्यवेक्षकों तक के दाैरे हुए। अब बरसात का दाैर पूरा हो गया तो हड़बाड़ किसी को याद नहीं है। पीड़ित परिवार अपने हाल पर आंसू बहा रहे हैं।

अतिवृष्टि ने जाख-हड़बाड़ क्षेत्र को बुरी तरह प्रभावित किया। इसी वर्ष वह 13 अगस्त की रात थी जब लगातार बारिश से गैर तोक में धरती दरक गई। जमीन फट गई। सड़क के बीचोंबीच डरावनी दरारें उभर आईं। कुछ मकान झुक गए। कुछ बुरी तरह ध्वस्त हो गए। नौ परिवारों के घर, खेत, बगीचे, बहुत कुछ निगल गई यह त्रासदी। आपदा अगस्त के दूसरे सप्ताह में आई। अब नवंबर का दूसरा सप्ताह चल रहा है। उस वक्त कैमरों की चमक थी। नेताओं के काफिले और अधिकारियों के जत्थे दौड़े। अब सन्नाटा पसरा हुआ है। कोई हाल पूछने भी नहीं आता।

प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत कमला देवी का घर बना था। सपनों का छोटा घर जिसे उन्होंने अरमानों से संजोया था। अब वहां दरकती उम्मीदों और मायूसी का मलबा पड़ा है। ग्रामीण नंदा बल्लभ की आटा चक्की और ललित सिंह की दुकान तबाह हो चुके हैं। पेयजल लाइन टूटी है। बिजली के खंभे झुके हुए हैं। जिंदगी जुगाड़ के भरोसे चल रही है। गांव नीचे की ओर खिसक रहा है। कब बड़ा हादसा हो जाए, कोई नहीं जानता। गांव की बुजुर्ग महिला बसंती देवी की आंखों में चिंता है। चार बच्चों का परिवार है लेकिन जीवन के बाकी दिन गुजारने के लिए जगह नहीं है। जगदीश सिंह कहते हैं कि बहुत नेता आए। तस्वीरें खिंचवाईं और चले गए। अब कोई देखने के लिए भी नहीं आता कि हम जिंदा भी हैं या नहीं। हमारा मकान ध्वस्त हो गया है। जमीन अब भी खिसक रही है।

जिला आपदा कंट्रोल रूम का रिकॉर्ड बताता है कि कमला देवी पत्नी कुंदन सिंह, जगदीश सिंह पुत्र चतुर सिंह, गोपाल सिह पुत्र चतुर सिंह, पवन सिंह पुत्र चतुर सिंह, पूरन राम पुत्र केशर राम, प्रताप राम पुत्र पूरन राम, रोहित कुमार पुत्र प्रताप राम, नंदा बल्लभ पांडे पुत्र किशनानंद, ललित सिंह पुत्र कुंवर सिंह आदि आपदा प्रभावितों को सुरक्षित स्थानों पर शिफ्ट कराया गया।

हड़बाड़ आज भी टूटीं सड़कों और दरकीं दीवारों के बीच हाशिए पर पड़ा सिसक रहा है। अब पटवारी, तहसीलदार, डीएम, नेता नहीं आते। गैर तोक के लोग फिर उसी खामोशी में घिर गए हैं जहां उनका दुख सिर्फ दरकी हुई दीवारें सुनती हैं। नौ परिवार जिनके पास अब न जमीन है और ना ही न छत। बस एक उम्मीद है कि शायद एक दिन कोई उनका दर्द बांटने जरूर आएगा।

शरण स्थलों पर जिंदगी का संघर्ष

राज्य सरकार की ओर से विस्थापन की बात हुई थी लेकिन अब तक ठोस समाधान नहीं हुआ। नौ परिवारों का जीवन पंचायत में अटका है। प्रशासन ने सभी नौ परिवारों को पंचायत घर, प्राथमिक विद्यालय और आंगनबाड़ी केंद्र में शिफ्ट किया। वहां न तो पर्याप्त सुविधाएं हैं और ना ही निजता का कोई स्थान। दिन में प्राइमरी के छात्र और आंगनवाड़ी के बच्चे उन कक्षों की बेंचों पर पढ़ते हैं। पीड़ित परिवारों का सामान पीछे ढककर रखा जाता है। फिर ये लोग उन्हीं में किसी तरह रात काटते हैं। खाना राहत किट से भरोसे है। रेडक्रॉस सोसायटी ने कंबल, तिरपाल और किचन सेट बांटे हैं… मगर पुरखों की जमीन से बेदखल होने का दर्द कोई किट नहीं भर सकती।

राहत की फाइलें गांव नहीं लौटीं

13 अगस्त की रात बारिश से हुए भारी नुकसान की खबर 15 अगस्त को जिला मुख्यालय पहुंच सकी। सरकारी अमला स्वतंत्रता दिवस मनाने में व्यस्त था लेकिन निर्देश जारी करने और चिंता जताने का सिलसिला शुरू हुआ। अगले दिन से नेताओं और अधिकारियों का गांव में आना-जाना शुरू हुआ। इसी सिलसिले में तत्कालीन डीएम आशीष भटगांई, एसडीएम प्रियंका रानी और दिल्ली से आई केंद्रीय टीम ने भी 9 सितंबर को मौके पर जाकर निरीक्षण किया। रिपोर्ट तैयार हुई। फोटो खींचे। फाइलें आगे बढ़ीं। अब सर्दी दरवाजे पर है। उन फाइलों का क्या हुआ, कोई नहीं जानता। हर साल आपदा के बाद राहत की तस्वीरें आती हैं लेकिन राहत खुद क्यों नहीं आती… हड़बाड़ की हवा में यही सवाल तैर रहा है।

राहत शिविर किसी आपदा से कम नहीं

राहत शिविर के कमरे खुद बदहाल हैं। दीवारों में पड़ी दरारें और सीलनयुक्त फर्श सरकारी इंतजामों को बयां करने के लिए काफी हैं। प्राथमिक स्कूल और आंगनबाड़ी केंद्र में दिन में बच्चे बैठते हैं तो ये लोग पॉलीथिन और तिरपाल से सामान छिपाकर अपने टूटे घरों और बर्बाद खेतों की ओर चले जाते हैं। वहीं बंधे मवेशियों की देखभाल करते हैं। बच्चों के घर जाने के बाद रात बिताने फिर शिविरों में लौट जाते हैं।

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चीन-पाकिस्तान को धूल चटाई… अपनों से हार गए

हड़बाड़ निवासी पूर्व सैनिक सूबेदार उदय सिंह आपदा के दिन को याद कर सिहर उठते हैं। सौभाग्य से उनकी देहरी तक आपदा के पैर नहीं पड़े। उनके भाइयों के घर तबाह हो गए और वे राहत शिविर में दिन गुजारने के लिए मजबूर हैं। उदय सिंह बताते हैं कि कारगिल युद्ध के समय उन्होंने द्रास सेक्टर में पाकिस्तान को धूल चटाई। श्रीलंका भेजी गई भारतीय शांति सेना के भी सक्रिय सदस्य रहे। वह रुआंसे होकर कहते हैं कि पटवारी, तहसीलदार से लेकर दिल्ली-देहरादून तक सबको हाल मालूम है लेकिन कोई मदद नहीं कर रहा। वह एकीकृत उत्तर प्रदेश के दौर की याद करते हुए कहते हैं कि तीन दशक पहले उनका अपना घर बरसात में टूट गया था। तब भी तत्कालीन मायावती सरकार से कोई सहायता नहीं मिली। वह सवाल उठाते हैं कि जब आमजन की सुध कोई नहीं ले रहा तो अलग राज्य बनने से क्या फायदा हुआ।

दर्द और उम्मीदें

हम रोज दिन में अपने टूटे घर-आंगन की ओर आते हैं। जानवरों की रखवाली करते हैं। फिर रात बिताने राहत शिविर में चले जाते हैं। अफसरों-नेताओं के आश्वासन में जो संवेदना दिखी वो हकीकत में नहीं उतरी। – कमला देवी

हर रात डर के साए में बीतती है। गांव का हिस्सा लगातार नीचे की ओर खिसक रहा है। हमारे चार बच्चों का परिवार खतरे में है। -बसंती देवी, बुजुर्ग महिला

शुरुआत में खाने-पीने के लिए पूछा गया। थोड़े पैसे भी दिए गए। तब हर ओर आश्वासन की गूंज थी कि सबकी मदद होगी। अब कोई नहीं पूछ रहा कि जिंदा हैं या मर गए। -पूरन राम

बयानों की गर्मी कैसे देगी सर्दी में राहत

हड़बाड़ में आपदा प्रभावितों के विस्थापन और मुआवजे के बाबत अधिकारियों को अब तक हुई प्रगति को बिंदुवार तैयार करने के लिए कहा गया है। देहरादून से लौटने के बाद अधिकारियों के साथ बैठक की जाएगी। जल्द से जल्द प्रभावितों का सुरक्षित स्थान पर पुनर्वास कराने का प्रयास किया जाएगा। -सुरेश गढि़या, भाजपा विधायक, कपकोट

हड़बाड़ में कई लोगों के घर बर्बाद हुए हैं। मैंने आपदा के बाद प्रभावित क्षेत्र का दौरा किया था और राहत के लिए अधिकारियों से चर्चा की थी। सवाल पूछने पर अधिकारी कागजी बातें करते हैं। उनके काम की समीक्षा नहीं की जाती। जिले के प्रभारी मंत्री भी इसके लिए जवाबदेह हैं। यह सिर्फ बागेश्वर की कहानी नहीं, पूरे प्रदेश का हाल है। -यशपाल आर्य, नेता प्रतिपक्ष व कांग्रेस विधायक

हड़बाड़ के आपदा प्रभावितों के विस्थापन की प्रक्रिया अंतिम चरण में चल रही है। अगले कुछ दिनों में समाधान निकाल लिया जाएगा। विस्थापन की कार्रवाई शुरू कर दी जाएगी। – आकांक्षा कोंडे, जिलाधिकारी बागेश्वर

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